संसदीय नियंत्रण : शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर संक्षिप्त टिप्पणी

प्रश्न: भारत में सरकार और प्रशासन पर संसदीय नियंत्रण व्यावहारिक की अपेक्षा सैद्धांतिक अधिक है। चर्चा कीजिए।

दृष्टिकोण:

  • उत्तर के आरम्भ में शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत पर संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए।
  • रेखांकित कीजिए कि सरकार और प्रशासन पर कुछ सीमा तक संसदीय नियंत्रण क्यों महत्वपूर्ण है।
  • उन विभिन्न तरीकों को स्पष्ट कीजिए जिनके माध्यम से भारतीय संसद कार्यपालिका पर नियंत्रण स्थापित करती है।
  • इनके अप्रभावी होने के पीछे निहित कुछ कारणों का उल्लेख कीजिए।

उत्तर:

भारतीय संविधान द्वारा सरकार के संसदीय स्वरूप की स्थापना की गई है जिसमें कार्यपालिका अपने कृत्यों और नीतियों के लिए संसद के प्रति उत्तरदायी होती है। कैबिनेट के सदस्यों का चयन विधायिका से किया जाता है। मंत्री सामान्यतः संसद के प्रति सामूहिक रूप से तथा विशेष रूप से लोकसभा के प्रति उत्तरदायी होते हैं। वे अपने पद पर तब तक बने रह सकते हैं जब तक उन्हें लोकसभा में बहुमत प्राप्त होता है।

संसद कार्यपालिका पर प्रश्नकाल, शून्यकाल, अल्पावधि की चर्चा, ध्यानाकर्षण प्रस्ताव, स्थगन प्रस्ताव, अविश्वास प्रस्ताव, निंदा प्रस्ताव आदि के माध्यम से नियंत्रण रखती है। यह अपनी समितियों जैसे सरकारी आश्वासनों संबंधी समिति, अधीनस्थ विधान संबंधी समिति इत्यादि के माध्यम से कार्यपालिका के कार्यों का अधीक्षण करती है।

अधिनियमित किए जाने वाले किसी भी कानून को संसद के दोनों सदनों के सदस्यों के बहुमत के अनुमोदन की आवश्यकता होती है। यहां तक कि प्रत्यायोजित/कार्यपालिका विधान संबंधी विषयों पर नियमों और विनियमों को परीक्षण के लिए संसद के समक्ष प्रस्तुत किए जाने की आवश्यकता होती है।

कार्यपालिका के वित्तीय मामलों पर संसद बजटीय नियंत्रण और बजट पश्चात् नियंत्रण स्थापित करती है। संसद के अनुमोदन के बिना कार्यपालिका न तो किसी कर का आरोपण और संग्रहण कर सकती है तथा न ही किसी प्रकार का व्यय कर सकती है। संसद भी अपनी समितियों की सहायता से सरकारी व्यय और वित्तीय निष्पादन की जाँच करती है।

हालांकि, वास्तविक रूप में कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण व्यावहारिक की अपेक्षा सैद्धांतिक अधिक है। इसके लिए निम्नलिखित कारक उत्तरदायी हैं:

  • देश का प्रशासन इतना विशाल एवं जटिल है कि संसद के पास न तो इतना समय है और न ही इतनी विशेषज्ञता है कि वह प्रशासन पर प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर सके।
  • सांसद सामान्यतः साधारण व्यक्ति होते हैं जिन्हें तकनीकी प्रकृति वाली अनुदान मांगों को बेहतर ढंग से समझने में कठिनाई होती है।
  • बहुमत प्राप्त होने के कारण कार्यपालिका को विधायी नेतृत्व प्राप्त होता है। परिणामस्वरूप, यह नीतियों के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है और अपनी प्रभावी आलोचना की संभावनाओं को कम करती है।
  • जांच समितियों द्वारा सार्वजनिक व्यय हो जाने के पश्चात् (न की पहले) इनका निरीक्षण किया जाता है। ‘गिलोटिन’ के बढ़ते प्रचलन के कारण वित्तीय नियंत्रण की सम्भावना भी सीमित हो जाती है।
  • प्रत्यायोजित विधान के विस्तार के परिणामस्वरूप संसद की विधि निर्माण की शक्ति में कमी तथा अधिकारी वर्ग की शक्तियों में वृद्धि हुई है।
  • सशक्त, स्थिर और सिद्धांतवादी विपक्ष के अभाव ने प्रशासन पर विधायी नियंत्रण की प्रभावशीलता को भी कम कर दिया  है।

चूंकि, संसदीय नियंत्रण सामान्यतः विभिन्न बिन्दुओं पर विस्तारित, साधारण एवं राजनीतिक प्रकृति का होता है, इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि भारत में सरकार और प्रशासन पर विधायी नियंत्रण व्यावहारिक की अपेक्षा सैद्धांतिक अधिक है और यह नियंत्रण उतना प्रभावी नहीं है जितना इसे होना चाहिए।

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *


The reCAPTCHA verification period has expired. Please reload the page.