अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान (Minority Educational Institutions)

अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान (MEIs) क्या हैं?

इन संस्थानों की स्थापना अल्पसंख्यक समुदायों की विशिष्ट संस्कृति एवं परंपरा को संरक्षित करने तथा प्रोत्साहन देने हेतु की जाती है। अल्पसंख्यक समुदायों को भाषायी अथवा धार्मिक समूहों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

मानदंड क्या हैं?

NCMEI के द्वारा अनुच्छेद 30 के तहत शैक्षणिक संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान हेतु कुछ दिशा-निर्देश जारी किए गये हैं।

अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त करने हेतु संस्थान को प्रभावी रूप से दो शर्तों को पूर्ण करना होता है।

  • बोर्ड या ट्रस्ट के अधिकांश सदस्यों को अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित होना चाहिए।
  •  इसे स्पष्ट रूप से घोषित करना चाहिए कि इसकी स्थापना अल्पसंख्यक समुदाय के हित के लिए की गई है।

राज्य प्राधिकरणों ने भी समान मानदंड निर्धारित किए हैं।

संवैधानिक प्रावधान

भारतीय संविधान मौलिक अधिकार के रूप में शिक्षण संस्थानों की स्थापना और प्रशासन करने के अल्पसंख्यक वर्गों के अधिकार को मान्यता प्रदान करता है।

अनुच्छेद 29

  • अल्पसंख्यक-वर्गों के हितों के संरक्षण संबंधित है। इसमें यह उपबंध किया गया है कि भारत के राज्य क्षेत्र या उसके किसी भाग के निवासी नागरिकों के किसी अनुभाग, जिसकी अपनी विशेष भाषा, लिपि या संस्कृति है, को उसे बनाए रखने का अधिकार होगा।

अनुच्छेद 30

  • धर्म या भाषा के आधार पर सभी अल्पसंख्यक वर्गों को अपनी रुचि के शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन का अधिकार होगा। शिक्षण संस्थाओं को सहायता प्रदान करने में राज्य किसी शिक्षण संस्था के विरुद्ध इस आधार पर विभेद नहीं करेगा कि वह धर्म या भाषा पर आधारित किसी अल्पसंख्यक-वर्ग के प्रबंधन में है।

हालिया विवाद

  • वर्ष 2016 में केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में एक शपथ-पत्र दाखिल करते हुए कहा कि किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान का दर्जा प्रदान नहीं किया जा सकता है।
  • उच्चतम न्यायालय के द्वारा 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय के विरुद्ध अपील की सुनवाई की जा रही रही थी जिसमें अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) को प्राप्त अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा निरस्त कर दिया गया।
  •  कानून मंत्रालय ने NCMEI के 2011 के उस निर्णय को निरस्त करने की अनुशंसा की है, जिसमें उसने जामिया मिलिया इस्लामिया को भी उसी आधार पर धार्मिक अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में घोषित किया था।

शिक्षा संस्थानों को अल्पसंख्यक का दर्जा कौन प्रदान करता है?

  • वर्तमान में राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग (NCMEI) संपूर्ण भारत में अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों के  प्रमाणीकरण का विनियमन करता है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने भी इसकी शक्तियों को मान्यता दी है। कुछ राज्यों ने मान्यता एवं प्रमाणन के लिए स्वयं के दिशानिर्देश भी निर्धारित किए हैं।
  • यह NCMEI अधिनियम, 2004 के तहत, मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा अधिसूचित छः धार्मिक समुदायों [मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जोरास्ट्रियन (पारसी) तथा जैन] से सम्बद्धता के आधार पर शिक्षा संस्थानों को अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान करता है।
  • इसकी स्थापना 2004 में संसद द्वारा राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग (NCMEI) अधिनियम के माध्यम से की  गई। 2006 में NCMEI को किसी भी सक्षम प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध अपील की शक्ति भी प्रदान कर दी गई।

NCMEI के कार्य एवं शक्तियाँ

  • यह एक अर्ध-न्यायिक निकाय है, जिसे सिविल न्यायालय की शक्तियां प्राप्त हैं। इसका नेतृत्व एक अध्यक्ष के द्वारा किया जाता है। उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुके किसी व्यक्ति को इसका अध्यक्ष बनाया जाता है तथा इसके तीन अन्य सदस्यों को केंद्र सरकार द्वारा मनोनीत किया जाता है।
  •  आयोग 3 प्रकार के कार्यों अर्थात् न्यायिक, परामर्शी और अनुशंसात्मक दायित्वों का निर्वहन करता है
  • यह किसी विश्वविद्यालय की अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थान के साथ संबद्धता से सम्बंधित विवादों पर निर्णय करता है।
  • इसे अल्पसंख्यक वर्गों के उनकी रुचि की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना एवं प्रशासन के अधिकार के उल्लंघन या उनसे वंचित किए जाने से संबंधित शिकायतों की जांच करने व स्वत: संज्ञान लेने की शक्ति प्राप्त है।
  • अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित उनकी रुचि के संस्थानों के अल्पसंख्यक दर्जे तथा चरित्र को प्रोत्साहित एवं संरक्षित करने के उपायों को निर्दिष्ट करता है।
  •  यह संस्थानों द्वारा अनुदान की शर्तों का उल्लंघन करने पर उन्हें प्रदत्त अल्पसंख्यक दर्जे को निरस्त भी कर सकता है।
  •  आयोग के अधिकार को भाषायी अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित शिक्षण संस्थानों तक विस्तारित नहीं किया जा सकता है।

अल्पसंख्यक दर्जे के प्रावधान क्यों बरकरार रखा जाना चाहिए?

  •  धार्मिक तथा भाषायी अल्पसंख्यकों की शिक्षण संस्थाओं की स्थापना का अधिकार, अनुच्छेद 30 (1) के तहत एक संवैधानिक अधिकार है।
  • अनुच्छेद 26 (a) यह उपबंध करता है कि धार्मिक संप्रदाय धार्मिक तथा पूर्त प्रयोजनों के लिए संस्थाओं की स्थापना कर सकते हैं। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) और जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी (JMIU) मुस्लिम युवाओं को शिक्षा प्रदान करके अल्पसंख्यक समुदाय के अंर्तगत सामाजिक परिवर्तन लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, जिसे अनुच्छेद 26 (a) के तहत पूर्त प्रायोजन माना जा सकता है।
  • अनुच्छेद 38 राज्य को समाज के विभिन्न वर्गों के मध्य असमानता समाप्त करने हेतु निर्देश देता है तथा AMU और JMIU जैसे अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान गुणवत्तायुक्त व औपचारिक शिक्षा प्रदान कर अल्पसंख्यकों के मध्य परिवर्तन लाने की भूमिका का निर्वहन करते हैं।
  • 1967 के अज़ीज़ बाशा वाद में उच्चतम न्यायालय ने निर्णय दिया कि विश्वविद्यालय अनुच्छेद 30 (1) में उल्लिखित “शैक्षणिक संस्थान” की परिभाषा के अंतर्गत आते हैं। इस प्रकार, यह सरकार के लिए अनिवार्य हो जाता है कि वह इस प्रकार के अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को विधि के माध्यम से मान्यता प्रदान करे।
  • केरल एजुकेशन बिल वाद में उच्चतम न्यायालय ने राज्य की अल्पसंख्यक दर्जे को निरस्त करने और अल्पसंख्यकों को ऐसे संस्थानों की स्थापना एवं प्रबंधन के अधिकार से वंचित करने की शक्ति को सीमित कर दिया। इस दर्जे को

निरस्त क्यों किया जाना चाहिए?

  • एक विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्रदान नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका गठन केवल संसदीय अधिनियम के माध्यम से ही किया जा सकता है। चूंकि AMU और JMIU को एक अधिनियम के माध्यम से स्थापित किया गया है, इसलिए इन संस्थानों को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों (MEIs) के रूप में मान्यता प्रदान नहीं की जा सकती है।
  • राज्यों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से वित्त पोषित विश्वविद्यालयों को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्रदान नहीं किया जा सकता, क्योंकि इससे अनुच्छेद 27 के साथ टकराव की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। अनुच्छेद 27 अनुसार राज्य द्वारा कर के रूप में एकत्रित धनराशि को किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की अभिवृद्धि या पोषण में व्यय नहीं किया जा सकता है।
  • संसदीय अधिनियम के तहत स्थापित विश्वविद्यालयों को केंद्र सरकार की आरक्षण नीति का पालन करना होता है, परंतु AMU और JMIU अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों को किसी प्रकार का आरक्षण प्रदान नहीं करते हैं। ऐसे संस्थानों को प्रदत्त अल्पसंख्यक दर्जा असंवैधानिक तथा अवैध है।
  •  संविधान के अनुच्छेद 15 में यह उपबंध किया गया है कि राज्य धर्म के आधार पर विभेद नहीं करेगा और संसद या राज्य द्वारा स्थापित किसी भी संस्था को अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान करना इसका उल्लंघन होगा।
  • 1967 के अज़ीज़ बाशा वाद में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि AMU अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थान नहीं है क्योंकि यह ब्रिटिश विधायिका द्वारा स्थापित किया गया था, न कि मुस्लिम समुदाय द्वारा।
  • अनुच्छेद 30 (1) के तहत प्रदत्त अधिकार असीमित अधिकार नहीं है और यह अनुच्छेद 29 (2) के विरोधाभास में प्रतीत होता है। अनुच्छेद 29 यह उपबंध करता है कि राज्य द्वारा पोषित या राज्य-निधि से सहायता प्राप्त किसी शिक्षा संस्था में प्रवेश से किसी भी नागरिक को केवल जाति, भाषा, मूलवंश या धर्म के आधार पर वंचित नही किया जाएगा।”

अन्य संबंधित तथ्य

हाल ही में, मानव संसाधन मंत्रालय ने भाषायी आधार पर किसी शैक्षणिक संस्थान को अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान नहीं करने का निर्णय लिया है।

भाषाई अल्पसंख्यक संस्थानों (LMIs) से संबंधित मुद्दे

  •  संविधान के अनुच्छेद 350B के अंतर्गत नियुक्त भाषाई अल्पसंख्यक-वर्गों के लिए राष्ट्रीय आयुक्त (NCLM) को NCMEI की तुलना में कम शक्ति प्रदान की गई है।
  •  यह केवल भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए उपबंधित रक्षोपायों से संबंधित विषयों का अन्वेषण कर सकता है और अपने
    निष्कर्षों के आधार पर संसद को अनुशंसाएं प्रस्तुत कर सकता है।

अल्पसंख्यक दर्जे के तहत प्रदत्त विशेषाधिकार

  • अनुच्छेद 30 में यह उपबंध है कि राज्य द्वारा संपत्ति के अनिवार्य अर्जन के मामले में संस्था को उपयुक्त क्षतिपूर्ति प्रदान की जानी चाहिए।
  • अनुच्छेद 15 के तहत अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान आरक्षण नीति के दायरे से बाहर हैं। हाल ही में, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने अल्पसंख्यक शिक्षा संस्थानों के पक्ष में निर्णय देते हुए कहा कि इन्हे पिछड़े वर्गों के छात्रों के लिए सीट आरक्षित करने की आवश्यकता नहीं है।
  • शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE) 2009 की धारा 12 के तहत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) से संबंधित बच्चों के लिए 25% आरक्षण अनिवार्य है। यह अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों पर लागू नहीं होता है।
  • 2002 के TMA पाई बनाम कर्नाटक राज्य वाद में,
  •  उच्चतम न्यायालय ने अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थानों को एक पृथक, उचित, पारदर्शी तथा योग्यता-आधारित प्रवेश प्रणाली अपनाने की स्वीकृति प्रदान की।
  •  ये अपनी एक पृथक शुल्क संरचना को अपना सकते है, परंतु केपिटेशन फी लेने की अनुमति नहीं दी गयी है।

इस विवाद से सम्बंधित इतिहास

अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी

  •  AMU की स्थापना वर्ष 1875 में मोहम्मडन एंग्लो ओरिएंटल कॉलेज के रूप में हुई थी। 1920 में भारतीय विधायी परिषद  के एक अधिनियम द्वारा इसे सांविधिक दर्जा प्रदान किया गया।
  • 1967 के अज़ीज़ बाशा वाद में उच्चतम न्यायालय ने तर्क दिया कि AMU अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान नहीं है क्योंकि इसकी स्थापना ब्रिटिश विधायिका द्वारा की गई थी , न कि मुस्लिम समुदाय द्वारा।
  • 1981 में संसद ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU) अधिनियम में संशोधन द्वारा इसके अल्पसंख्यक दर्जे को पुनः बहाल किया।
  • 2006 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1981 के संशोधन अधिनियम को इस आधार पर निरस्त कर दिया कि यह संविधान से अधिकारातीत (Ultra Vires) है।
  • यह मामला अभी उच्चतम न्यायालय के विचाराधीन है।

जामिया मिलिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी

  • इसकी स्थापना वर्ष 1920 में खिलाफत आन्दोलन के दौरान हुई थी तथा इसे 1988 में संसद द्वारा सांविधिक दर्जा प्रदान किया गया था।
  •  2011 में सरकार ने इसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा प्रदान किया।

अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों (MEIs) द्वारा सामना की जाने वाली चुनौतियाँ:

  •  अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को नाममात्र की स्वायत्तता प्राप्त है क्योंकि वे सरकार द्वारा धन प्राप्त करते हैं। उदाहरण के लिए, भारत का राष्ट्रपति इन विश्वविद्यालयों के किसी भी निर्णय को अमान्य घोषित कर सकता है, जबकि उसे निजी विश्वविद्यालयों के संबंध में ऐसी कोई भी शक्ति प्राप्त नहीं है।
  • वास्तविक मुद्दा इन अल्पसंख्यक संस्थानों में व्याप्त कुप्रशासन है। कई गैर-सहायता प्राप्त निजी अल्पसंख्यक संस्थान अव्यवस्थित हैं। और कुप्रबंधन, भ्रष्टाचार इत्यादि से पीड़ित हैं। उदाहरणार्थ अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित सीटें गैर-अल्पसंख्यक उम्मीदवारों को बेच दी जाती हैं।
  • शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम के दायित्वों से प्राप्त छूट ने संस्थानों के मध्य प्रतिफल न देते हुए अधिक लाभ अर्जित करने की प्रवृत्ति (rent-seeking behaviour) को बढ़ावा दिया है। अल्पसंख्यक समुदायों के गरीब वर्गों के बच्चे ऐसे संस्थानों में प्रवेश लेने में सक्षम नहीं हो पाते हैं जिससे इन संस्थानों की स्थापना का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है।
  • राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं जैसे राष्ट्रीय पात्रता व प्रवेश परीक्षा (NEET) तथा साझा काउंसलिंग ने अब अल्पसंख्यक संस्थानों द्वारा अपने पसंदीदा छात्रों को प्रवेश देने के अधिकार को समाप्त कर दिया है।
  • कई स्कूलों ने RTE अधिनियम, 2009 के तहत दायित्वों से बचने के लिए जाली (fake) अल्पसंख्यक प्रमाणपत्र की सहायता ली है।

आगे की राह

  •  केवल तकनीकी कमियों के चलते अल्पसंख्यक दर्जे को निरस्त नहीं किया जाना चाहिए। आख़िरकार, अल्पसंख्यक इन संस्थाओं के निर्माण में अपने संसाधन, सम्पत्तियों और समय का निवेश तो करते ही हैं, साथ ही में इनमें 50% गैर-अल्पसंख्यक बच्चों को भी शिक्षा प्रदान करते हैं।
  • वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में व्याप्त अस्पष्टताओं तथा अंतरालों को समाप्त किया जाना चाहिए ताकि अल्पसंख्यक दर्जे का उपयोग कल्याण एवं न्यायसंगत शिक्षा की कीमत पर निजी हितों के लिए न किया जा सके।
  • ऐसे विश्वविद्यालयों को पाठ्यक्रम निर्धारण तथा संचालन में अधिक स्वायत्तता प्रदान की जानी चाहिए।
  •  न्यायालय ने निरंतर यह कहा है कि सरकारी सहायता प्राप्त करने का अर्थ अल्पसंख्यक चरित्र का त्याग करना नहीं है। अतः सरकार अन्य विश्वविद्यालयों के समान ही अल्पसंख्यक संस्थानों को भी वित्त पोषण प्रदान कर सकती है।
  • शिक्षा का अधिकार (RTE) से सभी अल्पसंख्यक संस्थानों को छूट देने के उच्चतम न्यायलय के निर्णय की समीक्षा की जानी चाहिए।
  • भाषायी अल्पसंख्यकों के लिए पृथक मानदंड विकसित किए जाने चाहिए क्योंकि NCMEI द्वारा धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए तैयार मानदंडों को भाषाई अल्पसंख्यकों पर अविवेकपूर्ण रूप से लागू नहीं किया जा सकता है। उदाहरणार्थ, भाषायी अल्पसंख्यक संस्थानों में शिक्षा उन्हीं की भाषा के माध्यम से दी जानी चाहिए। वर्तमान में महाराष्ट्र ही एकमात्र ऐसा राज्य है जहां इस प्रकार के मानदंड की व्यवस्था है।

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