लचीली और स्थिर विनिमय दर प्रणाली के मध्य अंतर
प्रश्न: लचीली और स्थिर विनिमय दर प्रणाली के मध्य अंतर स्पष्ट करते हुए, समझाइए कि लचीली विनिमय दर प्रणाली के अंतर्गत विनिमय दर कैसे निर्धारित होती है।
दृष्टिकोण:
- विनिमय दर को परिभाषित करते हुए उत्तर आरंभ कीजिए।
- लचीली और स्थिर विनिमय दर प्रणाली के मध्य अंतर स्पष्ट कीजिए।
- समझाइए कि एक लचीली विनिमय दर प्रणाली के अंतर्गत विनिमय दर किस प्रकार निर्धारित होती है।
उत्तर:
किसी मुद्रा का अन्य मुद्राओं के सापेक्ष मूल्य ‘विनिमय दर’ के रूप में वर्णित किया जाता है। सामान्यतया विनिमय दर को निर्धारित करने के लिए दो प्रकार की व्यवस्थाएं- स्थिर विनिमय दर प्रणाली और लचीली विनिमय दर प्रणाली अपनायी जाती हैं।
दोनों के मध्य अंतर
- स्थिर विनिमय दर मुद्रा की ऐसी विनिमय दर होती है जो किसी निश्चित स्तर पर अमेरिकी डॉलर या स्वर्ण जैसे कुछ मानदंडों के आधार पर निर्धारित की जाती है और यह कभी-कभी ही समायोजित की जाती है। जबकि लचीली (Flexible/floating) विनिमय दर ऐसी विनिमय दर होती है, जिसे विदेशी मुद्रा बाजार में मांग और आपूर्ति कारकों द्वारा निर्धारित किया जाता है।
- स्थिर दर सरकार या केंद्रीय बैंक द्वारा निर्धारित की जाती है और उसे उसी स्तर पर बनाए रखा जाता है। परन्तु लचीली प्रणाली में केंद्रीय बैंक विनिमय दर के स्तर को प्रत्यक्षत: प्रभावित करने हेतु कोई उपाय नहीं करते हैं।
- स्थिर विनिमय दर व्यवस्था में अस्थिरता और उतार-चढ़ाव की संभावना कम होती है तथा सामान्यतः यह सरकारी नीति में परिवर्तन पर निर्भर करती है, जबकि लचीली विनिमय दर व्यवस्था के तहत मुद्रा, अस्थिरता एवं उच्च उतार-चढ़ाव के प्रति अतिसंवेदनशील होती हैं, क्योंकि यह दिन-प्रतिदिन की बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
- स्थिर व्यवस्था में विनिमय दर में परिवर्तन को अवमूल्यन या पुनर्मूल्यन (revaluation) के रूप में जाना जाता है जबकि लचीली व्यवस्था में इसे मूल्यह्रास या मूल्यवृद्धि के रूप में वर्णित किया जाता है।

एक लचीली विनिमय दर प्रणाली के तहत विनिमय दर का निर्धारण:
भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका के मॉडल के उदाहरण से एक लचीली विनिमय दर प्रणाली में विनिमय दर की निर्धारण प्रक्रिया को समझा जा सकता है:
- किसी लचीली विनिमय दर प्रणाली के तहत, विनिमय की संतुलनकारी दर विदेशी मुद्रा की मांग और आपूर्ति के कारकों द्वारा निर्धारित की जाती है। वस्तुओं और सेवाओं का आयात करने, विदेश में वित्तीय संपत्ति खरीदने तथा उपहार/अनुदान आदि भेजने के लिए विदेशी मुद्रा की मांग सृजित होती है। यह विनिमय दर के साथ प्रतिलोमत: संबंधित होती है अर्थात् विनिमय दर उच्च होने पर, प्रति इकाई डॉलर के लिए आवश्यक रुपयों की मात्रा उच्च होगी और विनिमय दर कम होने पर यह आवश्यकता कम होगी। इसलिए विनिमय दर के लिए आलेखित वक्र नीचे की ओर गिरावट की प्रवृत्ति दर्शाता है।
- इसी प्रकार, घरेलू वस्तुओं के निर्यात, विदेशी पर्यटकों के आगमन, प्रत्यक्ष निवेश करने वाले विदेशी निवेशकों, प्रेषण आदि के कारण विदेशी मुद्रा की आपूर्ति में वृद्धि होती है। विदेशी मुद्रा की आपूर्ति विनिमय दर के साथ प्रत्यक्षत: परिवर्तित होती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक उच्च विनिमय दर प्रति इकाई मुद्रा के रूप में अधिक रुपये अर्जित करती है। इससे निर्यातकों की लाभप्रदता बढ़ती है। इसलिए विनिमय दर के सापेक्ष खींचा गया आपूर्ति-वक्र आगे की ओर झुका हुआ होता है।
- लचीली विनिमय दर प्रणाली भुगतान संतुलन में किसी भी प्रकार के असंतुलन (disequilibrium) का स्वतः निवारण कर देती है। इसका अर्थ यह है कि भुगतान संतुलन में कोई भी कमी या अधिशेष स्वचालित रूप से विनिमय दर को एक संतुलन मूल्य की ओर अग्रसरित करता है, जिससे विदेशी मुद्रा की मांग और आपूर्ति पुन: समान हो जाती है।
- उदाहरणार्थ, यदि किसी अर्थव्यवस्था में घाटे की स्थिति उत्पन्न होती है अर्थात् आयात में निर्यात की तुलना में अधिक वृद्धि होती है, तो विदेशी मुद्रा की अतिरिक्त मांग सृजित होगी। इस प्रकार की मांग से विदेशी मुद्रा का अधिमूल्यन जबकि घरेलू मुद्रा का मूल्यह्रास होगा। आयात महँगे हो जाएंगे और निर्यात अधिक लाभप्रद होगा। विदेशी मुद्रा की मांग की मात्रा कम हो जाएगी और मात्रा की आपूर्ति में घाटा समाप्त होने तक वृद्धि जारी रहेगी। इस स्थिति में विनिमय दर का एक नया उच्चतर संतुलन मूल्य प्राप्त होगा। इसी प्रकार, भुगतान संतुलन में अधिशेष, घरेलू मुद्रा को अधिमूल्यन की ओर ले जाता है। फलत: निर्यात में गिरावट होती है तथा जब तक विनिमय दर के नए निचले संतुलन मूल्य पर अधिशेष समाप्त नहीं होता तब तक आयात में वृद्धि होती है।
- उत्तर में दिए गए चित्र में विदेशी मुद्रा विनिमय दर की अतिरिक्त मांग का वक्र विदेशी मुद्रा की मांग में वृद्धि के कारण DD से DIDI की ओर स्थानांतरित हो जाता है। वर्तमान संतुलन दर ro पर, EoK की सीमा तक विदेशी मुद्रा की अधिक मांग से घरेलू मुद्रा अर्थात् रुपये का मूल्यह्रास होगा। भारत में डॉलर की मांग अधिक होगी, जिसकी अब अमेरिका अधिक कीमत पर आपूर्ति करेगा। ऐसे में विनिमय दर बाजार नए उच्चतर संतुलन मूल्य E पर स्वतः स्थापित हो जाता है, जिसके अनुरूप नई विनिमय दर ।। प्रचलित होती है।
- विदेशी मुद्रा की आपूर्ति में वृद्धि से आपूर्ति वक्र SS से SS1 पर स्थानांतरित हो जाएगा। ro पर, EoL की सीमा तक विदेशी मुद्रा की अधिक आपूर्ति से भारतीय रुपये का अधिमूल्यन होगा अर्थात् विनिमय दर में कमी आएगी। ऐसे में विनिमय दर बाजार एक निम्नवर्ती नवीन संतुलन मूल्य E2 के लिए स्वत: सुधार करेगा, जिसके अनुरूप नई विनिमय दर 12 प्रचलित होगी।
