Judicial Pendency

राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत के न्यायालयों में 3 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।

विलंबन संबंधी महत्वपूर्ण तथ्य

  • राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG) के अनुसार, उत्तर प्रदेश में सर्वाधिक संख्या में लंबित मामले (61.58 लाख) हैं।
  • कुल लंबित मामलों में से 60% दो वर्ष से अधिक पुराने हैं, जबकि 40% पांच वर्ष से अधिक पुराने हैं। उच्चतम न्यायालय में, 30% से अधिक लंबित मामले पांच वर्ष से अधिक पुराने हैं, जबकि इलाहाबाद उच्च न्यायालय में 15% अपीलें 1980 के दशक से लंबित
  • नवीनतम इज ऑफ़ डूइंग बिजनेस रिपोर्ट में, अनुबंध को लागू करने संबंधी संकेतक में भारत की रैंकिंग (172 से घटकर 164 वें स्थान पर) में मामूली सुधार हुआ है।
  • 2009 की विधि आयोग की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि न्यायाधीशों की मौजूदा संख्या के साथ लंबित मामलों का निपटारा करने
    में 464 वर्ष लगेंगे।

विलंबन का कारण

  •  दायर याचिकाओं में सर्वाधिक सरकार द्वारा : न्यायालयों में दायर कुल याचिकाओं का 46% राज्य या केंद्र सरकारों द्वारा दायर
    मामले या अपीलें हैं।
  • जनसंख्या के अनुपात में न्यायाधीशों की कम संख्या: भारत में प्रत्येक दस लाख लोगों पर केवल 18 न्यायाधीश हैं, जबकि अमेरिका में न्यायाधीश-जनसख्या अनुपात 107 का है। 1987 में विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि भारत को प्रत्येक दस लाख आबादी के लिए न्यायाधीशों की संख्या 50 तक बढ़ा दी जानी चाहिए।
  • रिक्ति: भारत में 1.7 अरब लोगों के लिए, उच्चतम न्यायालय में 31 न्यायाधीश और उच्च न्यायालयों में 1,079 न्यायाधीश हैं। इनमें से उच्च न्यायालयों में कभी भी 600 से ज्यादा न्यायाधीश नहीं होते अर्थात शेष सीटें रिक्त रहती हैं। इसके अतिरिक्त, प्रक्रिया ज्ञापन
    (MoP) पर विवादों के कारण विभिन्न उच्च न्यायालयों में रिक्तियों की स्वीकृत संख्या के लगभग 50% पर ही नियुक्ति होती है।
  •  अत्यधिक कार्यभार: उच्च न्यायालयों में न्यायाधीश प्रत्येक दिन 20 से 150 मामलों की सुनवाई करते हैं, या प्रतिदिन औसतन 70
    मामले की सुनवाई करते हैं। प्रत्येक सुनवाई के लिए न्यायाधीशों के पास औसत समय 2 मिनट से भी कम हो सकता है।
  •  साक्ष्यों के वैज्ञानिक संग्रह के लिए पुलिस प्रशिक्षण का अभाव है तथा पुलिस और जेल अधिकारी भी अपने ड्यूटी को पूरा करने में
    असफल रहते हैं जिससे मामलों के विचारण में देरी होती है।
  •  न्यायाधीशों हेतु अवकाश: उच्चतम न्यायालय एक वर्ष में औसतन 188 दिन कार्य करता है, जबकि इसके नियमों में न्यूनतम 225
    दिनों का कार्य निर्दिष्ट किया गया है।
  • अवसंरचना का अभाव: जैसेकि न्यायाधीशों के लिए अपर्याप्त सहायक कर्मचारी और मूलभूत न्यायालय कक्ष सुविधाओं का अभाव। उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रकाशित 2016 की एक रिपोर्ट से ज्ञात होता है कि विद्यमान अवसंरचना अखिल भारतीय स्तर पर स्वीकृत 20,558 न्यायिक अधिकारियों की तुलना में केवल 15,540 न्यायिक अधिकारियों को सुविधा प्रदान कर सकती है।
  • न्यायालयों के प्रबंधकों की क्षमता का उपयोग न करना: न्यायालयों ने न्यायालय प्रबंधकों के पदों का सृजन किया है ताकि न्यायालयी प्रक्रियाओं में सुधार, मामलों की गति और न्यायिक समय को अनुकूलित किया जा सके। किन्तु अधिकांशतः उनके कार्य
    न्यायालयीय आयोजनों और संचालन संबंधी कार्यों को व्यवस्थित करने तक सीमित होते हैं।
  •  रणनीति निर्माण हेतु डेटा की अनुपलब्धता: कई अधीनस्थ न्यायालयों में अभी भी “डेट फिल्ड” कॉलम के तहत डेटा उपलब्ध नहीं
    रहता है, जो विलंबन को चिह्नित करने और इसे सुधारने हेतु सर्वाधिक महत्वपूर्ण है।

इसका प्रभाव

  • सामाजिक-आर्थिक पतन: एक कमजोर न्यायपालिका (सुनवाई परिणामों की गति और पूर्वानुमेयता द्वारा परिभाषित) के कारण प्रति व्यक्ति आय कम हो सकती है तथा
  • उच्च निर्धनता दर; निजी आर्थिक गतिविधि में कमी;
  • खराब सार्वजनिक अवसंरचना; और उच्च अपराध दर और अधिक औद्योगिक झगड़े आदि हो सकते हैं।
  • व्यवसाय की लागत में वृद्धि: निम्न प्रवर्तन के कारण, ऋणदाता द्वारा जोखिम प्रीमियम को शामिल करने के कारण, ऋणों पर ब्याज दर बढ़ जाएगी और सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था की लागत संरचना में वृद्धि होगी।
  • मौलिक अधिकार का उल्लंघन: उच्चतम न्यायालय के अनुसार संविधान का अनुच्छेद 21 कैदियों को उनके जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के भाग के रूप में निष्पक्ष और तीव्र सुनवाई का अधिकार प्रदान करता है।
  • निर्णय की गुणवत्ता प्रभावित होती है: एक दिन में किसी न्यायाधीश के समक्ष 100 से अधिक मामले सूचीबद्ध होने के कारण, प्रत्येक तथ्य के विश्लेषण हेतु बहुत कम समय उपलब्ध होता है।

आगे की राह

  • आर्थिक सर्वेक्षण 2017-18 में इज ऑफ़ डूइंग बिजिनेस (EODB) में सुधार और आर्थिक गतिविधियों को प्रोत्साहित करने के लिए वाणिज्यिक याचिकाओं के विलम्बन में कमी लाने हेतु सरकार और न्यायपालिका के मध्य समन्वित कार्रवाई की मांग की गयी है।
  • उच्चतर न्यायपालिका में नियुक्ति सम्बन्धी मुद्दों का शीघ्र ही समाधान किया जाना चाहिए। न्यायपालिका और कार्यपालिका को एक सामान्य आधार तक पहुंचना चाहिए और प्रक्रिया सम्बन्धी व्यावहारिक ज्ञापन-पत्र तैयार करना चाहिए।
  • वैकल्पिक विवाद समाधान तंत्र को सुदृढ़ बनाया जाना चाहिए और लोगों को इसके संबंध में अवगत कराया जाना चाहिए।
  • मामलों को समय पर, पारदर्शी और कुशल तरीके से निपटाने हेतु एक केस मैनेजमेंट सिस्टम (प्रत्येक मामले को दायर करने से लेकर निपटान तक की निगरानी हेतु एक तंत्र) की स्थापना के लिए सूचना और संचार प्रौद्योगिकी (ICT) उपकरण का प्रयोग करना।
  • आर्थिक प्रोत्साहन: यह अनुमान लगाया गया है कि यदि न्यायालयों के निर्णय में तीव्रता लाई जाए और विलम्बन को कम किया जाए, तो सकल घरेलू उत्पाद में 1-2% की वृद्धि करके आर्थिक विकास को बढ़ाया जा सकता है।
  • न्यायिक अधिकारियों के लिए पुराने मामलों (जहां आरोपी दो वर्ष से अधिक समय तक हिरासत में है) का निपटान करने के लिए वार्षिक लक्ष्य और कार्य योजना सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • जिला न्यायाधीशों की गुणवत्ता में सुधार लाने हेतु न्यायिक भर्ती परीक्षाओं के मानकों को निर्धारित करना।
  • सांध्यकालीन न्यायालयों की संकल्पना को कार्यान्वित करना। इसके तहत विधि स्नातकों के साथ-साथ सेवानिवृत्त न्यायाधीशों की सेवाएँ लेकर युवा न्यायाधीशों को प्रशिक्षित किया जा सकता है और विलंबन में कमी लायी जा सकती है।

2009 में 230वें विधि आयोग ने अपनी रिपोर्ट में “न्यायपालिका में सुधार” के अंतर्गत निम्नलिखित अनुशंसाएँ प्रस्तुत की हैं :

  •  न्यायालय के कामकाजी घंटों का पूरा उपयोग किया जाना चाहिए और स्थगन आदेश को सिविल दण्ड संहिता (CPC) के
    आदेश 17 के प्रावधानों द्वारा कठोरता पूर्वक निर्देशित किया जाना चाहिए।
  •  तकनीक की सहायता से समान प्रकृति के मामलों को एकत्र किया जाना चाहिए और प्राथमिकता के आधार पर ऐसे अन्य
    मामलों का निपटारा करना चाहिए; ।
  •  न्यायाधीशों को नागरिक और आपराधिक मामलों, दोनों में उचित समय के भीतर निर्णय देना चाहिए।
  •  उच्चत्तर न्यायपालिका में अवकाश को कम से कम 10 से 15 दिनों तक कम किया जाना चाहिए और अदालत के कामकाजी घंटों
    को कम से कम आधे घंटे के लिए बढ़ाया जाना चाहिए।
  • अधिवक्ताओं को अतिविस्तृत और दोहराव युक्त तर्को को कम करना चाहिए तथा किसी भी मामले में मौखिक तर्क की लंबाई
    एक घंटे और तीस मिनट से अधिक नहीं होनी चाहिए (जब तक कि मामला कानून के जटिल प्रश्न या संविधान की व्याख्या से
    संबंधित न हो)।
  •  निर्णय स्पष्ट ,निर्णायक और अस्पष्टता से मुक्त होना चाहिए, और आगे इससे संबंधित याचिकाएं नहीं उत्पन्न होनी चाहिए।

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